• अर्थ : हरीश मंगलम , अनुवाद : सत्यपाल यादव

    अर्थ

    हरीश मंगलम ,  अनुवाद : सत्यपाल यादव  

    हे कविता देवी !

    तुझे नचाना है

    मुझे हकीकत के परदे पर

    हमने कभी भी

    इन्द्रधनुषी सात रंगों का सुख नहीं भोगा

    उसी आकाश में

    एक के बाद एक झरते तारों को देखकर

    इन्द्रराज में से अपने घर

    मुझे पैदल जाना है

    देख,

    लिपाई की नक्काशी में बिलखते चोर

    खँडहर झोंपड़ी के खपरैल हटाकर

    कितना इन्तजार कर रहे हैं ?

    परियों के वेश में उड़ना आसान है

    तुझे पंख निकल आए वह स्वाभाविक है

    लेकिन

    चल नंगे पैर कंटीली जमीन पर

    मेघ अंधड़ पर सवारी करना बंद कर

    यहाँ बिना स्लेट-पेन धोला वाले बच्चे

    टकटकी लगाए सामने देख रहे हैं अनिमेष

    तेरे शब्दबद्ध तन से वाणी फूटेगी

    की अगर मगर ?

    तेरे श्रवण केन्द्र

    मधुर स्वर ही सुनने के आदी हैं

    आदमी की चीख सुनी है कभी ?

    तुझे याद आ जाए तेरी सौन्दर्यलक्षी देह

    हर शब्द लडखडाने लगे

    और हमें मिलता विश्वासघात

    डरकर शोर मचाने लगे तू चिड़िया की तरह

    तू बहक गयी सुन्दर रंगोली देखकर

    लेकिन

    मुझे नचाना है

    तुझे हकीकत के परदे पर

    और समझना है

    बेल के मुरझाने का अर्थ

    ***

     

     

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