• गुत्थी : फ़ारूक शाह , अनुवाद : उषा ज. मकवाणा

    Posted on February 3, 2013 by Yogesh Vaidya in Poetry Platform.

    गुत्थी  

    फ़ारूक शाह  

    अनुवाद : उषा ज. मकवाणा

     

    न कोई मनमेल

    न कोई

    एकदूसरे के तल तक पहुँचने

    हृदय से धँसते

    तिरोहित होकर

    एकता की भूमि पर

    उछलने की बात

     

     

    हम तो रहे वहीं के वहीं

    बिना अंकुरित हुए बीज जैसे

    मलिनता के कवच से मढ़े हुए

    किसी भी तरह की लेनदेन से रहित

    बिलकुल बंद

     

     

    हमारे भीतर शिखर पर

    कभी का राह देखता सच

    वृद्ध हो चुका

    उसे बाँहों में भरकर

    गगन में चकराकर

    वह हमदर्दीला गाना

    सुनने की बात तो

    अंत तक किनारे ही रही

    हम दीवारों को तोड़ न सके

    और न पार कर सके खाइयाँ

     

     

    तुम्हारा और मेरा

    कुछ भी नहीं हो सकता

    तुम्हारे और मेरे आधार पर

    सदियों से खड़ा यह विश्व

    अभी भी जंग लगा हुआ ही

     

     ***

     

Leave a Reply