• मेरा हाथ : करसनदास लुहार , अनुवाद : उषा ज. मकवाणा

    Posted on February 3, 2013 by Yogesh Vaidya in Poetry Platform.

     

    मेरा हाथ

    करसनदास लुहार ,  अनुवाद : उषा ज. मकवाणा
         

    मेरे हाथ में मशाल नहीं
    पर मेरा हाथ स्वयं मशाल है

    जंगलों को देखता हूँ
    हाथ में तीर-कमान लिए
    नगर की और आते हुए…
    मेरे आदिम रक्त से ऊठ रही हैं
    आग की लपटें

    मकाई के खेतों की चंचल सतह पर
    सूरज की शतसहस्र भुजाएँ
    लाल लाल रंगोली अंकित कर रही हैं
    पवन गिरकर भी फिर से खड़ा हो जाता है
    अंधकार सघन होते भी कम हो रहा है

    मेरा हाथ कंधे तक सुलग रहा है
    किसी के घने काले बालों में डूबोकर
    उसे बुझाने की इच्छा की ओस
    अब धूप में बदल गई है

    झोंपड़पट्टी की प्रसवपीड़ाओं !
    मेरी आँखों से गुजरकर बहो…
    लंगोटी पहने एक पाँव खड़े पहाड़ों को
    पैर नहीं पंख फुटे हैं, पानी जैसे पंख
    उसे अब खलबलाते हुए आता सुनता हूँ –

    इस नगर की वंध्य, संवेदनहीन जाँघ में.
    ऊँची ऊँची इमारतों की
    शेषनाग की फन पर खड़ी
    फौलादी नींव काँप रही हैं
    बंदूक की नोक से निकलती शक्ति के सूत्र
    पत्थरिली दीवारों को
    झकझोर कर रख देते हैं

    तेजाबी प्यास का रेगिस्तान जमे जा रहा है.
    वातावरण देखता है
    उन्मत्त पवन को मेरी सांसों उत्पन्न होकर
    चक्रवात में परिवर्तित होता

    बोलिविया के जंगली पेड़ों का एक एक पत्ता बनकर
    चे-गुवेरा की डायरी के
    लाल अक्षर से लिंपे हुए पन्नें
    यहाँ-वहाँ उड़ रहे हैं
    भूरे आकाश के एक टुकड़े पर
    हो-ची-मिन्ह का हाथ
    लिखे जा रहा है क्रांति की कविताएँ
    एलेन्दे का खूँखार प्रेत
    चिली की सुनसाम गलियों को
    घुमकर टटोल रहा है
    हाथ में थमी स्टेशनगन
    मशाल जैसे लपकरे ले रही है…

    मेरा हाथ सुलग रहा है
    फैलता जाता है उजाला
    उजाले को कैद करने और आवाज पर
    पाबंदियाँ लगाने का परिणाम
    तानाशाही के संवर्धित संस्करणों ने
    देख लिये हैं
    अब कोई फूँक नहीं मार सकेंगा
    मेरे हाथ को
    मेरा हाथ कभी भी न बुझने वाली मशाल है

    ***

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