• मेरे हिस्से का उजाला : हरजीवन दाफड़ा , अनुवाद : पारुल सिंह

    Posted on February 3, 2013 by Yogesh Vaidya in Poetry Platform.

    मेरे हिस्से का उजाला  

    हरजीवन दाफड़ा  ,    अनुवाद : पारुल सिंह

    नजर की सीमा के पार
    उदित हो गया है उजाला कब से !

    आकाश को छूते
    बर्बर समूहों के काले घने बादल
    और चारों तरफ फैली हुई

    अंधकारग्रस्त मनोवृत्तियाँ
    मुझे रोक रही हैं सीमा पार जाने से

    कुछ कहूँ तो जीभ काट ले
    आँख खोलूँ तो
    आरपार उतार दे
    तीखा और कडुवा धुआँ !
    हाथ बढ़ाऊँ तो
    काटकर अलग कर दे कंधे से
    यह बर्बर समूह
    पैर उठाऊँ तो धँस जाता हूँ
    सदियों पुराने रूढ़िचुस्त दलदल में !

    आँखें होते हुए भी मैं सूरदास
    हाथ-पैर सहित की पंगुता लेकर
    अस्मिता को इस तरह
    कब तक तड़पता रहूँ विवश होकर ?
    क्या मेरे हिस्से का वह उजाला
    यहाँ कोई नहीं दे सकेंगा मुझे

    ***

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