• लगता है कि : जीवण ठाकोर , अनुवाद : पारुल सिंह

    लगता है कि

                 जीवण ठाकोर  ,  अनुवाद : पारुल  सिंह          


    मुझे लगता है कि
    इस जंगल में आज तो
    जटा को सहलाऊँ
    और दहाड़ लगाऊँ

    कभी तो लगता है कि
    इन ऊँची ऊँची पहाड़ियों
    और गहरी गहरी खाइयों को
    एक छलांग में
    अश्व जैसी छलांग भरकर कूद जाऊँ

    केसरिया साफा सिर पर बाँधकर
    पूर्वजों की तलवार ढूँढ़कर, थामकर
    माथे पर लाल-लाल
    कुमकुम लगाकर
    पान चबाते-चबाते
    सभी को ‘राम राम’ करके
    रणभूमि की ओर कदम बढ़ाऊँ
    गज की चाल से चलते-चलते
    मूँछ पर ताव लगाऊँ
    और खँखारकर ललकार करूँ

    मुझे लगता है कि
    इस छत से उड़कर
    किसी मंजिले पर जाकर, बैठकर
    कलदार किलोल के स्वर में
    बिखर जाऊँ
    एक एक स्वर
    किसी कोयल के कण्ठ में पिरो दूँ
    और वसंत की तरह खिल जाउँ
    फिर
    कलियों से, फूलों से
    फलों से झूल जाऊँ

    और… और… और…
    साली यह खाँसी
    खो… खो… खो… करती
    मुझ पर अट्टाहास करती
    मुझे दबोचती है
    और मुश्किल से मैं सांस लेता हूँ
    तड़पता मैं अपने आपको देखता हूँ
    तो मैं यहाँ
    इन चार दीवारों के बीच कैद हूँ
    एक टूटी-फूटी दीवार पर मैं
    सहारा लेकर बैठा हूँ
    जीने के लिए संघर्ष कर रहा हूँ
    और अतिरिक्त तीन दीवारें
    मुझे देखती रहती हैं
    मेरी दशा पर
    अट्टाहास करती हैं मौज से
    हँसती जाती है, हँसती जाती है…
    और… और… मुझे लगता है कि…

                 ***

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