• खेत : अरविन्द वेगडा , अनुवाद : सत्यपाल यादव

     

    खेत

    अरविन्द वेगडा ,      अनुवाद : सत्यपाल  यादव

    हमें भी उगाया जाता हैं खेत में

    लेकिन

    हम उग नहीं सकते

    इसलिए सितम के चाबुक उठाकर

    वे लोग

    खेत जोतने खींचवा रहे हैं हल

    हल से

    पसीने के पानी में

    भूख के खाद के साथ

    अरमानों की बाई करते हैं.

     

    युगों से

    खेत लहराता हरा-भरा

    कसे हुए दानों से भरपूर

    परन्तु

    हमें खड़ा कर देते हैं बीच खेत में

    धुप की तरह

    हमारे ऊपर बैठकर खून सनी चोंच

    घिसता कुआ

    उड़ता है तब हम

    इस ओर उस ओर दौड़ते हैं

    नष्ट हुए खेत में

     

    ***

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