• हिंस्रता : मधुकान्त कल्पित , अनुवाद : पारुल सिंह

    हिंस्रता  

    मधुकान्त कल्पित  , अनुवाद : पारुल सिंह

     

    अभी
    कल ही मैंने काटे होगे नाखून
    इसलिए यह हाथ लग रहे हैं
    कितने सुहाने
    और सभ्यता से परिपूर्ण !

    परंतु अचानक
    आज क्या पता
    क्रुद्ध और क्षुधित हो उठा पूरा वातावरण
    एक पल में तो
    गली मेरी बन गई उन्माद की लपकती ज्वाला

    मुलायम उंगलियों के सिरे पर
    कातिल नाखून
    लगातार ऐसे बढ़ते जाते हैं
    ब… ढ़… ते… जाते हैं
    कि मन में लगता है
    नहीं हो सकते ऐसे हाथ मेरे !
    उंगलियों के सिरे भी कौन जाने
    नाखून को पंजों में दबाकर
    खिसकते –
    ऐसी कुशलता से खिसकते जाते झुण्ड में
    मुझे छोड़कर यहाँ उलझन में –

    मैं तो देखता रहूँ,
    मानो अपने आपको खोता रहूँ…

      ***

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